विश्लेषण : ट्रंप, टैरिफ और मगरु का मखाना, आपदा को अवसर में बदलने का लपकदार मौका

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विश्लेषण : ट्रंप, टैरिफ और मगरु का मखाना, आपदा को अवसर में बदलने का लपकदार मौका

Last Updated:April 03, 2025, 12:56 IST

Trump Tarif Impact on India: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का टैरिफ वार भारत की अर्थव्यवस्था पर चोट है या आपदा को अवसर में बदलने का सुनहरा मौका. इसके लिए आंकड़े खुद ही सब कुछ बयां करते हैं. इस लेख में अमेरिक…और पढ़ें

ट्रंप के टैरिफ का दुनिया पर क्या पड़ेगा असर.

हाइलाइट्स

  • अमेरिका को हर साल 1.4 ट्रिलियन डॉलर का व्यापार घाटा उठाना पड़ता है.
  • अमेरिका 50 प्रतिशत व्यापार सिर्फ कनाडा, मैक्सिको और चीन के साथ करता है.
  • अमेरिका के उपर जीडीपी का 123 प्रतिशत कर्ज है.

Trump Tarif Impact on India: औरंगजेब की मृत्यु तक भारत और चीन पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था का 50 प्रतिशत हिस्सा शेयर करते थे. तब तक अमेरिका सही से खड़ा भी नहीं हो पाया था. उसकी वैश्विक पहचान यूरोप के सहारे टिकी थी. समय का पहिया घूमा और परमाणु बम की विशाल धमक के साथ वह खुद विश्व का सरताज घोषित कर दिया. विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका दुनिया का महाजन बन बैठा. आधी धरती पर राज करने वाला ब्रिटेन भी अमेरिका का कर्जदार बन गया. 80-90 के दशक तक अमेरिका विश्व अर्थव्यवस्था की धुरी रहा. पर समय बहुत बलवान होता है. जिस अस्थिपंजर अर्थव्यवस्था चीन को उसने तकनीक शल्य क्रिया देकर पैरों के बल खड़ा किया, वही आज अमेरिका को उसकी जगह से हिला दिया. वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिकी धमक दरकने लगी. बेशक वह आज भी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और दूसरे नंबर का वैश्विक कोरोबारी है लेकिन अंदरुनी हालात खोखले होने लगे हैं. उसका व्यापार घाटा 1.4 ट्रिलियन डॉलर पहुंच गया है. यह इतनी रकम है जितनी में दो-चार छोटे देशों को खरीदा जा सकता है. लेकिन इस घाटे डोनाल्ड ट्रंप बहुत खिसिया गए हैं. इस बार लगता है कि मेरा वचन ही मेरा शासन है को ट्रंप मनवा के रहेंगे. उन्होंने अमेरिका में आयतित वस्तु और सेवाओं पर 54 प्रतिशत तक की चुंगी लगा दी. आखिर इसके मायने क्या हैं, क्या इससे दुनिया की अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी या इससे अमेरिका के बढ़ते व्यापार घाटा पर मरहम लग पाएगा.

क्या शिथिल हो जाएगी वैश्विक अर्थव्यवस्था
कुछ एक्सपर्ट का मानना है कि अमेरिकी टैरिफ के कारण विश्व का माल जब अमेरिका नहीं पहुंचेगा तो इससे उस देश का व्यापार घाटा बढ़ जाएगा और अंततः इससे उसकी अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा. कुछ एक्सपर्ट इससे वैश्विक आर्थिक मंदी की आशंका भी जता रहे हैं. लेकिन यह बातें सतही लगती है. आंकड़ों पर गौर से नजर डालें तो अमेरिका द्वारा वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाना अब टेढ़ी खीर लगता है. सीधे शब्दों में कहें तो अमेरिका में अब वो बात नहीं है. आज अमेरिका की वैश्विक व्यापार में हिस्सेदारी सिर्फ 13 प्रतिशत तक सिमट गई है. आज की स्थिति में अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदार बन गया है. उसके उपर 77 हजार अरब डॉलर या 7.7 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज है. अगर घरेलू कर्ज को मिला दिया जाए अमेरिका अपनी जीडीपी का 123 प्रतिशत कर्ज लिया हुआ है. हर साल यह कर्ज बढ़ता ही जा रहा है. क्योंकि हर साल अमेरिका को 1.14 ट्रिलियन डॉलर का व्यापार घाटा हो रहा है. आयात बढ़ता जा रहा है और निर्यात घटता जा रहा है. 1.86 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात के मुकाबले 3 ट्रिलियन डॉलर का आयात करता है. इस टैरिफ से वह कितनी भरपाई कर पाता है यह तो वक्त वताएगा लेकिन विश्व की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करना बहुत मुश्किल है क्योंकि दुनिया भर के देश अमेरिका से वस्तुओं के आयात को सीमित कर दिया है. दूसरा अमेरिका का 50 प्रतिशत व्यापार सिर्फ 3 देश कनाडा, मैक्सिको और चीन से है. जाहिर इन तीनों देशों पर इसका असर सबसे ज्यादा पड़ेगा. लेकिन क्या ये तीनों देश इतना कमजोर है कि वह इसे झेल नहीं पाने में असमर्थ हो जाएगा.

चीन, कनाडा और मैक्सिको पर असर

अब बात करते हैं इन तीनों देशों कनाडा, मैक्सिक और चीन की जहां अमेरिका का कुल 50 प्रतिशत व्यापार होता है. मतलब बाकी के लगभग 200 देशों के साथ उसका व्यापार 50 फीसदी है. किसी देश के साथ आधा का भी आधा प्रतिशत तो किसी देश के साथ 5 प्रतिशत. सबसे पहले बात चीन की. जैसा कि आप जानते ही हैं कि आज चीन वैश्विक बाजार का प्रमुख स्तंभ है. वैश्विक व्यापार में उसकी हिस्सेदार 17 प्रतिशत है. मान लिजिए ट्रंप के टैरिफ से चीन का एक भी सामान अमेरिका न पहुंचे. इससे चीन को क्या फर्क पड़ेगा इससे पहले जान लीजिए कि आज चीन दुनिया के देशों को 3.58 ट्रिलियन डॉलर का सामान भेजता. इसके मुकाबले वह दुनिया से 2.59 ट्रिलियन डॉलर का सामान और सेवा आयात करता है. इस हिसाब से उसके पास 0.99 ट्रिलियन का व्यापार फायदा होता है. वर्तमान आंकड़ों में चीन का वैश्विक व्यापार फायदा 1 ट्रिलियन यानी 1000 अरब डॉलर को पार कर गया है. अमेरिका चीन से 439.9 अरब डॉलर की वस्तु और सेवा मंगाता है. दूसरी ओर वह चीन को सिर्फ 144.5 अरब डॉलर की वस्तु और सेवा ही भेजता है. यानी अमेरिका को चीन के साथ व्यापार कर 295.4 अरब डॉलर का घाटा लग जाता है. तो क्या ट्रंप के टैरिफ से चीन का एक भी माल अमेरिका नहीं पहुंचेगा.

अर्थशास्त्र में इस तरह की बातें करना बेमानी है. पहले तो यह कि टैरिफ के कारण ऐसा कभी नहीं होगा कि चीनी माल वहां पूरी तरह से बिकना बंद हो जाए. इस व्यापार में चीनी सेवा का हिस्सा ज्यादा है जिसमें कमी आनी मुश्किल है. दूसरी ओर टैरिफ के बावजूद भी चीनी सामान की कीमत फिर भी कम होगी. इसलिए पूरी तरह से चीनी माल का अमेरिका में अंत होना मुश्किल है. उल्टा अमेरिकी जनता को ज्यादा कीमत देकर चीनी माल खरीदनी होगी. हालांकि ट्रंप के टैरिफ का निश्चित रूप से चीन पर असर पड़ेगा लेकिन चीन वैश्विक व्यापार में इतनी बुलंद स्थिति में है कि वह झट से इसकी भरपाई कर लेगा क्योंकि उसके सामने एशिया और अफ्रीका का विशाल बाजार है और विदेशी मुद्रा भंडार डॉलर से लबालब भरा है. कनाडा और मैक्सिको की अर्थव्यवस्था पर कुछ हद तक प्रभाव जरूर पड़ेगा लेकिन कनाडा का व्यापार घाटा तो सिर्फ 32.30 करोड़ डॉलर ही है लेकिन मैक्सिको का व्यापार घाटा 28.46 अरब डॉलर है. ऐसे में दोनों देशों पर आंशिक असर पड़ सकता है.

ट्रंप के टैरिफ से अमेरिकी लोगों पर क्या होगा असर
भारी चुंगी अपने देसी बाजार को संरक्षित करने के लिए लगाई जाती है. ताकि देश में जो कंपनियां सामान बना रही है वह सस्ती हो जाए और विदेशी वस्तुएं महंगी हो जाए. इससे व्यापार घाटा कम होगा और विदेशी मुद्रा के लिए बाजार से कर्ज लेना नहीं पड़ेगा. लब्बोलुआब यह है कि इससे देश को घाटा कम होगा और विदेशी मुद्रा बढ़ेगी. अमेरिका के लिए ऐसा करना इसलिए भी जरूरी था कि वह लगातार भारी घाटा से जूझ रहा है. पर क्या अमेरिका का यह कदम उसके लिए फायदेमंद साबित होगा. जब भी कोई देश विदेशी वस्तु पर चुंगी लगाता है तो स्वभाविक रूप से उस वस्तु की कीमत बढ़ जाती है. ट्रंप ने कनाडा से आयतित ऑटोमाइबाइल पार्ट्स और गाड़ियों पर 25 प्रतिशत का टैरिफ लगाया है. अगर इसे उदाहरण में समझें तो कनाडा से आयतित शेवी सिल्वेराडो कार की वर्तमान में 50 हजार डॉलर कीमत है लेकिन चुंगी लगने के बाद इसकी कीमत 62500 डॉलर हो जाएगी. इसी तरह चीन से आने वाले वाशिंग मशीन जो वर्तमान में 749 डॉलर में मिल रहा है अब 835 डॉलर में मिलेगी. तो इससे अमेरिका के घरेलू बाजार पर क्या असर पड़ेगा. जाहिर बात है लोग इस तरह की महंगी चीजों के विकल्प पर विचार करेगा. इससे इन वस्तुओं की आवक में कमी आएगी और व्यापार घाटा को संतुलन मिलेगा. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. इस टैरिफ से अमेरिकी लोग ही खुश नहीं है. अमेरिका में पहले से ही मंहगाई दर सांतवे आसमान पर है. चूंकि लोगों को आवश्यक सामान तो खरीदना ही है, इसलिए लोग गुस्से में हैं. मुश्किल यह है कि अगर वह विदेशी वस्तुओं के विकल्प वाले सामान का देसी वर्जन खरीदता है तो पहले से ही महंगा है. इस हालात में वह क्या करेगा. जिन लोगों की क्रय शक्ति ज्यादा है वह उन्हीं विदेशी वस्तुओं को उंची कीमत पर खरीदेगा. इससे उनका बचत कम होगा जो आखिरकार अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं है. बाकी लोग इसे कुछ समय के लिए टाल देंगे या कम स्टैंडर्ड सामान पर विचार करेगा. ऐसे में इस चुंगी का वैसे ही पूरी तरह असर नहीं होगी.

क्या भारत में मंगरू के मखाने की कीमत कम हो जाएगी
हमारे गांव में मंगरू मुखिया है जिसका पेशा मखाने का कारोबार है. वह दो बीघे जमीन किराए पर लेकर उसमें मखाना उपजाता है. पिछले कुछ सालों से मखाने की कीमत में तेजी आई है. इसका कारण पश्चिमी देशों के बाजार में मखाने के प्रति जबरदस्त दिलचस्पी बढ़ी है. फिलहाल वह 1200 रुपये किलो मखाना बेचकर खुश है और अच्छी खासी रकम साल में कमा लेते हैं. उसे कोई मतलब नहीं है कि मखाना कहां जाता है. भारत अमेरिका को 1,359 खेप मखाना भेजता है. तो क्या ट्रंप के टैरिफ से क्या मंगरु के मखाने के कारोबार में मंदी आएगी. इससे पहले जान लीजिए भारत और अमेरिका का व्यापार कितना है. भारत ने 2024 में 60 अरब डॉलर की वस्तु और सेवा भेजी लेकिन सिर्फ 35 अरब डॉलर की मंगवाई. इस प्रकार भारत अमेरिका के साथ व्यापार कर 25 अरब डॉलर अतिरिक्त रकम जुटा लेता है. ट्रंप को यह नागवार गुजरता है. उनका तो यहां तक कहना है कि भारत टैरिफ किंग है जो हमारे सामानों पर तो 70-70 प्रतिशत तक टैरिफ लगा देता है लेकिन हम उन्हें सब्सिडी देते हैं. यह बात कुछ हद तक सही भी है लेकिन इसका क्या विकल्प है. हम जो अमेरिका को निर्यात करते हैं उनका बहुत बड़ा हिस्सा सेवा है जिसे अमेरिका चाहकर भी बंद नहीं कर सकता.

मान लीजिए ट्रंप के टैरिफ से हमारा आधा माल अमेरिका नहीं पहुंचा तो हमें तो भी 12 अरब डॉलर का ही नुकसान झेलना होगा. लेकिन मोतीलाल ओसवाल के विश्लेषण की मानें तो भारत मुख्य रूप से 6 प्रमुख सेक्टर में 42.2 अरब डॉलर का सामान निर्यात करता है. यह हमारी अर्थव्यवस्था का 1.1 प्रतिशत है. अगर ये पूरे सेक्टर प्रभावित भी होते हैं हमारी दनदनाती अर्थव्यवस्था पर यह धूल के बराबर असर होगा. अब बात करते हैं मंगरु के मखाने की. तो मखाना किसी और देश में होता ही नहीं. दूसरा मखाने का स्वाद अमेरिकियों को ऐसा लग गया है कि अगर उसे 200 डॉलर में वहां बेचा जाए तो लोग उसे खरीदेंगे ही क्योंकि कई अमेरिकन एंटरप्रेन्योर यहां से मखाने को खरीदकर उसे विभिन्न तरह के फ्लेवर में प्रोसेस कर ऊंची कीमत में बेचने लगे हैं. ऐसे में मंगरु के मखाने पर क्या असर होगा आप खुद ही समझ जाइए.

भारत कैसे लपके आपदा में अवसर के मौके
भारत अमेरिका को मुख्य रूप से इलेक्ट्रिकल मशीनरी, जेम्स एंड ज्वेलरी, फर्मास्युटिकल प्रोडक्ट, न्यूक्लियर रिएक्टर के लिए मशीनरी, आयरन और स्टील तथा सीफूड का निर्यात करता है. ट्रंप के टैरिफ से ऐसा लगता है कि इस सेक्टर में मंदी आएगी क्योंकि यह सामान वहां पहुंचेगा नहीं जिससे प्रोडक्शन में कमी आएगी. अगर इसे दूसरे चश्मे से देखा जाए तो इस चुनौती में शानदार मौके छिपे हैं. जब अमेरिका में सामान नहीं जाएगा तो यह यहां ज्यादा हो जाएगा. ज्यादा माल होने पर कीमत घटानी होगी. कीमत घटाने से बिक्री बढ़ेगी. बिक्री बढ़ने से प्रोडक्शन को फिर से बढ़ावा मिलेगा. दूसरी तरफ ट्रंप के टैरिफ की जवाब में हम टैरिफ तो नहीं लगा सकते क्योंकि हम पहले से ही ज्यादा टैरिफ लगाए हुए हैं. ऐसे में हम अमेरिकी सामान का आयात कम कर सकते हैं. इस स्थिति में जो सामान हम अमेरिका से मंगवा रहे है, उसे खुद ही बनाने के लिए निवेश करेंगे. अमेरिकी टेक्नोलॉजी या चीनी टेक्नोलॉजी के कारण वहां की वस्तुएं सस्ती होती है जो टेक्नोलॉजी हमारे पास नहीं है. भारत हर चीज में बहुत बाद में जागता है. नई-नई टेक्नोलॉजी को विकसित करने में भी हमारा रवैया ऐसा ही है. लेकिन ट्रंप के टैरिफ दंड से हम चेतेंगे और सस्ती टेक्नोलॉजी विकसित करने के लिए जबरन प्रोत्साहित होंगे. चीन सस्ती टेक्नोलॉजी के दम पर ही आज वैश्विक अर्थव्यवस्था में रीढ़ की हड्डी बना हुआ है. मध्यकाल तक भारत और चीन की वैश्विक अर्थव्यवस्था में बादशाहत थी. लगभग 500 सालों से हम दोनों देश इसमें बहुत पिछड़ गए थे. चीन वैश्विक बाजार में अपनी पुरानी जगह बहुत तेजी से हासिल करने की स्थिति में आ गया है. अब भारत की बारी है. भारत ट्रंप के इस टैरिफ की आपदा में अवसर को आसानी से लपक सकता है. अगर हम रिसर्च पर निवेश करें तो सस्ती टेक्नोलॉजी बनाकर देश ही नहीं दुनिया के बाजार में अपना सामान फैला सकते हैं. 1991 में वित्तमंत्री के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा था कि जब किसी चीज का समय आ जाता है तो दुनिया की कोई ताकत इसे रोक नहीं सकती. लगता है यह समय आ गया है. बेशक यह ट्रंप के टैरिफ के दबाव में हो लेकिन हमें हर हाल में आयात को कम करना होगा और टेक्नोलॉजी के दम पर अपने सामान के निर्यात को बढ़ाना होगा. (आंकड़ों में थोड़ा-बहुत कमी-ज्यादा नेचुरल है.)

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ट्रंप, टैरिफ और मगरु का मखाना, आपदा को अवसर में बदलने का लपकदार मौका

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