ट्रंप को भांप गए थे जयशंकर, जेलेंस्की भी सुन लेते उनकी भविष्यवाणी, तो नहीं होती ऐसी लड़ाई

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ट्रंप को भांप गए थे जयशंकर, जेलेंस्की भी सुन लेते उनकी भविष्यवाणी, तो नहीं होती ऐसी लड़ाई

Last Updated:March 02, 2025, 22:04 IST

Jaishankar on Donald Trump: एस जयशंकर ने तो मानो डोनाल्ड ट्रंप को पहली ही नजर में भांप लिया था. उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति को लेकर जो बातें कहीं, वह पूरी तरह सही साबित होती दिख रही हैं. उनकी बातों को सुनकर तो …और पढ़ें

डोनाल्ड ट्रंप को लेकर एस जयशंकर की भविष्यवाणी सही साबित होती दिख रही है.

हाइलाइट्स

  • जयशंकर ने तो मानो डोनाल्ड ट्रंप को पहली ही नजर में भांप लिया था.
  • उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति को लेकर जो बातें कहीं, वह सही साबित होती दिखीं.
  • जेलेंस्की ने उनकी ये बातें सुन ली होती तो शायद वह भी ट्रंप से ऐसे न भिड़ते.

भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर की कूटनीतिक सूझबूझ और उनकी स्पष्ट विदेश नीति को लेकर कोई संदेह नहीं है. आज भारतीय विदेश मंत्री का लोहा पूरी दुनिया मानती है. उनकी बातें अक्सर वैश्विक राजनीति की गहरी समझ का प्रमाण देते हैं. इस बीच दुनियाभर में खलबली मचाने वाले डोनाल्ड ट्रंप को लेकर कही उनकी एक बात सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की इन दिनों यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की से हुई गर्मागर्म की खूब चर्चा है. कहा तो यह भी जा रहा है कि अगर जेलेंस्की ने जयशंकर की यह बात सुन समझ ली होती तो वह ट्रंप से इस तरह नहीं भिड़ते.

जयशंकर ने ट्रंप के बारे में जो कहा था, वह आज पूरी तरह सच साबित होता दिख रहा है. उन्होंने साफ तौर से ट्रंप को ‘अमेरिकन राष्ट्रवादी’ करार दिया था, जो अपने देश के हितों को सर्वोपरि रखते हैं और अनावश्यक विदेशी खर्च को लेकर बेहद सतर्क हैं.

ट्रंप को लेकर जयशंकर की भविष्यवाणी
ट्रंप को लेकर जयशंकर ने कहा था कि, ‘भई, अभी हम उनके मेहमान बनकर गए थे. हम उनके उद्घाटन शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए थे. उन्होंने हमारा बहुत अच्छा स्वागत किया, बहुत अच्छा ट्रीटमेंट दिया. अब यह भी तो एक तरह से उनका संदेश ही होता है, ना?

जयशंकर ने इसके साथ ही कहा, ‘लेकिन अगर गंभीरता से देखा जाए, तो मैं महसूस करता हूं कि वह एक तरह से अमेरिकन राष्ट्रवादी हैं. उन्हें लगता है कि जो कुछ भी अमेरिका के लिए करना जरूरी है, वही किया जाना चाहिए. क्योंकि अमेरिका ने पिछले अस्सी वर्षों में पूरी दुनिया की एक तरह से जिम्मेदारी उठाई है. और उन्हें लगता है कि अनावश्यक रूप से बहुत सारे क्षेत्रों में पैसा खर्च किया गया- जो शायद नहीं किया जाना चाहिए था. उनके हिसाब से यह पैसा अमेरिकी जनता पर केंद्रित होना चाहिए था.’

डोनाल्ड ट्रंप जब पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे, तब भी उनकी विदेश नीति इसी विचारधारा पर आधारित रही. उन्होंने ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति को अपनाते हुए कई अंतरराष्ट्रीय संधियों और गठबंधनों में बदलाव किए, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि उनका ध्यान अमेरिकी हितों पर ही केंद्रित था.

वैसे एस जयशंकर ने यह बात 30 जनवरी को दिल्ली के हंसराज कॉलेज में छात्रों के साथ ‘युवाओं के लिए विकसित भारत’ विषय पर बातचीत के दौरान कही थी, लेकिन अब ओवल ऑफिस में डोनाल्ड ट्रंप के साथ जेलेंस्की की हुई तीखी बहस के बाद उनकी ये बातें सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही हैं.

जेलेंस्की के लिए कैसा संदेश
अगर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की भी जयशंकर की इस समझ को स्वीकार करते और डोनाल्ड ट्रंप से बातचीत के दौरान इस तरह का संतुलन साधते, तो शायद स्थिति इतनी विकट न होती.

अमेरिका ने शुरुआती दौर में यूक्रेन को सैन्य और आर्थिक मदद का भरोसा दिया, लेकिन युद्ध के लंबे खिंचने के बाद अब वही अमेरिका अपने हितों को प्राथमिकता देने लगा है- बिल्कुल उसी तरह, जैसे जयशंकर ने पहले ही भविष्यवाणी की थी.

भारत की कूटनीति और जयशंकर की स्पष्ट नीति
भारत हमेशा अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ पर जोर देता रहा है और जयशंकर की विदेश नीति इसी सिद्धांत पर आधारित है. उन्होंने अमेरिका और रूस दोनों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे और यूक्रेन युद्ध पर किसी एक पक्ष का पूरी तरह समर्थन करने से बचते रहे.

जयशंकर की यह स्पष्ट सोच और दीर्घकालिक दृष्टिकोण ही भारत को वैश्विक शक्ति के रूप में उभरने में मदद कर रहा है. उन्होंने न केवल भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत किया बल्कि रूस के साथ भी भारत के पुराने और घनिष्ठ संबंधों को बनाए रखा.

आज जब दुनिया अमेरिका की बदलती विदेश नीति, ट्रंप की विचारधारा और रूस-यूक्रेन युद्ध के प्रभावों को देख रही है, तो एस. जयशंकर की कही गई बातें और भी प्रासंगिक लगती हैं. अगर जेलेंस्की ने जयशंकर जैसी कूटनीतिक दूरदृष्टि अपनाई होती और अमेरिका की नीतियों को गहराई से समझा होता, तो शायद ट्रंप से झगड़ा इतना तूल नहीं पकड़ता.

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ट्रंप को भांप गए थे जयशंकर, जेलेंस्की भी सुन लेते उनकी बात, तो नहीं होती लड़ाई

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