अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव लड़ने के दौरान टैरिफ प्लान को वैश्विक स्तर पर लागू करने का वादा किया था. जिसे ट्रंप ने पूरा किया और उनके द्वारा घोषित टैरिफ प्लान 2 अप्रैल 2025 से प्रभावी हो गया. यह टैरिफ प्लान, जिसे ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ या ‘पारस्परिक टैरिफ’ के रूप में जाना जाता है, उन देशों पर जवाबी शुल्क लगाने के लिए डिजाइन किया गया है जो अमेरिकी निर्यात पर उच्च टैरिफ लगाते हैं. यह तत्काल प्रभाव से अमेरिका के दुनिया भर के व्यापारिक भागीदारों पर लागू हो गया है.
ट्रंप ने अपने चुनावी अभियान के दौरान और पदभार ग्रहण करने के बाद बार-बार इस बात पर जोर दिया था कि वह अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और घरेलू उद्योगों को संरक्षण देने के लिए टैरिफ का इस्तेमाल करेंगे. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस टैरिफ प्लान के पीछे किस शख्स का हाथ है. इसके पीछे पीटर नवारो का दिमाग है, जो एक प्रमुख अमेरिकी अर्थशास्त्री हैं. नवारो डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति पद के दौरान व्यापार नीति को आकार देने वाले एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं.
ट्रंप प्रशासन में वरिष्ठ सलाहकार
पीटर नवारो ट्रंप के दूसरे प्रशासन में ट्रेड और मैन्युफैक्चरिंग के वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं. ट्रंप के चार दिसंबर 2024 को राष्ट्रपति चुने जाने के बाद नवारो ने यह भूमिका 20 जनवरी, 2025 को संभाली. नवारो को ट्रंप की आक्रामक टैरिफ रणनीति के पीछे इंटेलैक्चुअल फोर्स के रूप में जाना जाता है. नवारो के बारे में यह भी कहा जाता है कि वह राष्ट्रपति के संरक्षणवादी व्यापार एजेंडे के पीछे ‘मेन ब्रेन’ हैं. उनका प्रभाव अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने, व्यापार घाटे को कम करने और अन्य देशों, विशेष रूप से चीन द्वारा अनुचित व्यापार प्रथाओं का मुकाबला करने के लिए टैरिफ का उपयोग करने में लंबे समय से चले आ रहे विश्वास से उपजा है.
अर्थशास्त्र में की हुई है पीएचडी
नवारो का जन्म 15 जुलाई, 1949 को मैसाचुसेट्स में हुआ था. उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पीएचडी की डिग्री हासिल की. राजनीति में प्रवेश करने से पहले, वह कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, इरविन में अर्थशास्त्र और पब्लिक पॉलिसी के प्रोफेसर थे. अपने अकादमिक करियर के दौरान नवारो ने ‘द कमिंग चाइना वॉर्स’ (2006) और ‘डेथ बाय चाइना’ (2011) जैसी किताबें लिखीं. इन किताबों में उन्होंने चीन की आर्थिक नीतियों की आलोचना की है. उनके ये विचार ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ फिलॉसफी के साथ मेल खाते थे. इसी वजह से ट्रंप ने 2016 के अभियान के दौरान नवारो को ट्रेड एडवाइजर के रूप में अपने साथ जोड़ा और उसके बाद उन्हें सरकार में महत्वपूर्ण भूमिकाएं मिलीं.
चीन के साथ ट्रेड वॉर शुरू करने का श्रेय
ट्रंप के पहले कार्यकाल (2017-2021) में अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर शुरू करने का श्रेय नवारो को जाता है. उन्होंने ही चीनी सामान पर टैरिफ के लिए जोर दिया था. नवारो ग्लोबल सप्लाई चेन को अमेरिका में वापस लाने की वकालत करते रहे हैं. ट्रंप के पहले कार्यकाल में उन्होंने व्हाइट हाउस कार्यालय के ट्रेड एंड मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी के निदेशक के रूप में काम किया. यह पद विशेष रूप से उनके लिए बनाया गया था. उनका प्रभाव ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भी जारी रहा, जहां वे टैरिफ प्रस्तावों के पीछे प्रेरक शक्ति रहे हैं. स्टील और एल्यूमीनियम आयात पर 25 फीसदी टैरिफ, चीनी वस्तुओं पर 10 फीसदी टैरिफ और सभी अमेरिकी व्यापारिक भागीदारों पर पारस्परिक टैरिफ की योजनाएं नवारो की बनाई हुई हैं. नवारो का तर्क है कि ये उपाय राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी हैं. इनसे ना केवल नौकरियां पैदा होंगी बल्कि रेवेन्यू भी आएगा.
चीन रहा नवारो के निशाने पर
नवारो का ध्यान मुख्य रूप से अमेरिका के सबसे बड़े आर्थिक प्रतिद्वंद्वी चीन से निपटने को लेकर रहा. उनकी व्यापार नीतियों का उद्देश्य चीन के प्रभाव का मुकाबला करना है. भारत, एक महत्वपूर्ण वैश्विक खिलाड़ी होने के बावजूद, चीन, कनाडा या मेक्सिको की तरह नवारो के टैरिफ प्लान का केंद्रीय लक्ष्य नहीं रहा है. हालांकि, भारत भी नवारो की पारस्परिक टैरिफ से अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुआ है. जैसे भारत कुछ अमेरिकी निर्यात (जैसे, कृषि उत्पाद और निर्मित वस्तुएं) पर उच्च टैरिफ लगाता है, जबकि उसकी तुलना में अमेरिका आमतौर पर भारतीय आयात पर जो टैरिफ लगाता था वो कम था. लेकिन नए टैरिफ प्लान में नवारो ने ऐसे असंतुलन को दूर करने का प्रयास किया है. हालांकि इससे अमेरिका-भारत व्यापार संबंधों पर खराब असर पड़ सकता है.
जब भारत को हुई दिक्कत
नवारो के संरक्षणवादी रुख के कारण ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान, अमेरिका-भारत व्यापार में दिक्कत पैदा हुई. 2018 में, अमेरिका ने स्टील और एल्यूमीनियम टैरिफ लगाए जिससे भारत प्रभावित हुआ. जिसके कारण नई दिल्ली ने बादाम और मोटरसाइकिल जैसे अमेरिकी सामानों पर जवाबी टैरिफ लगाया. हालांकि, अभी तक नवारो ने भारत को सीधे टारगेट करने वाला ना कोई बयान दिया है और ना कोई कार्रवाई की है. नवारो के सामने पहली चिंता चीन है, ना कि भारत. लेकिन अगर भारत की व्यापार नीतियां अमेरिकी हितों के साथ मेल नहीं खाती हैं तो वो नवारो के निशाने पर आ सकता है.
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