Supreme Court Bemoans Lack Of Toilet Facilities: सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी अदालत परिसरों में पुरुषों, महिलाओं, दिव्यांगों और थर्ड जेंडर के लिए अलग टॉयलेट बनाने का निर्देश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट अपने-अपने राज्यों में इस आदेश का पालन सुनिश्चित करने के लिए कहा है. इस आदेश में यह भी कहा गया है कि राज्य सरकारें इस काम के लिए उचित फंड उपलब्ध करवाएं.
असम के रहने वाले वकील राजीब कलिता की याचिका पर आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे बी पारडीवाला और आर महादेवन की बेंच ने कहा कि स्वच्छ शौचालय की उपलब्धता बुनियादी मानव अधिकार है. यह बहुत दुखद है कि देश मे बड़ी संख्या में ऐसे कोर्ट हैं, जहां इनकी बेहद कमी है. ग्रामीण क्षेत्रों में तो कई जगह जज तक के लिए उचित टॉयलेट मौजूद नहीं है.
‘न्याय मांगना हर नागरिक का अधिकार’कोर्ट ने कहा कि न्याय मांगना हर नागरिक का अधिकार है. इसके लिए ही वह न्यायालय में आते हैं. कोर्ट में आने वाले लोगों की संख्या के अनुसार शौचालय सुविधा का न होना न्याय की प्रक्रिया में बाधा डालने वाली बात है. इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती. कोर्ट परिसर में पुरुषों और महिलाओं के अलावा थर्ड जेंडर और दिव्यांगों के लिए भी पर्याप्त शौचालय होने चाहिए. उनकी साफ-सफाई का भी पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए.
‘बच्चों की जरूरत के मुताबिक भी हो टॉयलेट सुविधा’
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि परिवार न्यायालयों (फैमिली कोर्ट) में बच्चे भी आते हैं. उनके परिसर में बच्चों की जरूरत के मुताबिक भी टॉयलेट सुविधा होनी चाहिए. महिलाएं अपने नवजात शिशुओं की देखभाल कर सकें, इसके लिए भी ऐसी जगह बनाई जानी चाहिए जैसी एयरपोर्ट में होती है. इसके अलावा भी सुप्रीम कोर्ट ने कई तरह के निर्देश दिए हैं.
‘बार एसोसिएशन के प्रतिनिधि को भी इस कमेटी में रखा जाए’
सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट से कहा है कि वह 6 सप्ताह के भीतर इस आदेश के मुताबिक आगे की कार्यवाही सुनिश्चित करने के लिए एक कमेटी बनाएं. इस कमेटी की अध्यक्षता के लिए चीफ जस्टिस किसी जज को मनोनीत करें. हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार, राज्य के मुख्य सचिव, पीडब्ल्यूडी सचिव और वित्त सचिव के अलावा बार एसोसिएशन के भी प्रतिनिधि को इस कमेटी में रखा जाए. यह कमिटी सभी अदालत परिसरों में हर दिन आने वाले लोगों की संख्या का आकलन करते हुए पर्याप्त शौचालय विकसित करने की योजना बनाए और उस पर अमल करवाए. सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट से 4 महीने में इस बारे में प्रगति रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है.
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