दुनियाभर में बड़ी उथल-पुथल जारी है. इसी बीच एक अच्छी खबर ये है कि तेल की कीमतें अगस्त 2021 के बाद सबसे निचले स्तर पर आ गईं है. अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते टकराव, नए टैरिफ, और ओपेक प्लस (OPEC+) के फैसलों से निवेशकों में घबराहट पैदा हुई और उसका नतीजा क्रूड की कीमतों में गिरावट के तौर नजर आया. शुक्रवार को कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत 65 डॉलर (करीब 5,420 रुपये प्रति बैरल) से गिरकर 64.72 डॉलर (करीब 5,400 डॉलर प्रति बैरल) पर पहुंच गई. यह कीमत अगस्त 2021 के बाद का सबसे निचला स्तर है. बता दें कि ओपेक प्लस में तेल निर्यातक देशों का एक बड़ा ग्रुप शामिल है, जो उत्पादन के स्तर को तय करता है.
क्रूड ऑयल मार्केट को सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब चीन ने अमेरिका से आने वाले सभी सामानों पर 34 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लगाने का ऐलान कर दिया. यह 10 अप्रैल से लागू होगा. यह घोषणा डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 180 देशों पर टैरिफ लगाए जाने के एक दिन बाद की गई. चीन द्वारा की गई घोषणा ने ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट्स में कोहराम मच दिया.
ब्रेंट क्रूड वायदा कीमतों में 5.52 डॉलर यानी 7.87 प्रतिशत की गिरावट आई और यह 64.62 डॉलर पर बंद हुआ, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड में 5.86 डॉलर यानी 8.10 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई और यह 61.09 डॉलर पर पहुंच गया. यह गिरावट पिछले छह महीनों में साप्ताहिक आधार पर सबसे बड़ी मानी जा रही है.
मंदी की आशंका प्रबलजहां ट्रंप के टैरिफ ने तेल की कीमतों पर दबाव डाला, वहीं इसका प्रभाव केवल एनर्जी मार्केट तक सीमित नहीं रहा. दुनियाभर के निवेशकों में घबराहट फैल गई और उन्होंने अपनी पूंजी को सुरक्षित ठिकानों की तरफ मूव करना शुरू कर दिया, मसलन बॉन्ड्स, जापानी येन और सोना. इस कदम से मंदी की आशंका और गहरी हो गई है. अमेरिकी डॉलर इंडेक्स भी गिरकर 101.96 पर आ गया, जो सितंबर के बाद का न्यूनतम स्तर है.
रायटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, तेल दलाल PVM के जॉन इवांस ने कहा कि “ट्रंप के शुल्क और OPEC+ की सप्लाई बढ़ाने की योजना के बीच तेल बाजार के पास अब गिरावट के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा. यह वही हाल है, जैसा महामारी के दौरान देखने को मिला था.” उन्होंने यह भी जोड़ा कि एशियाई बाजारों में गिरावट अब और तेज होती जा रही है.
तेल बिकवाली को तब और हवा मिली, जब OPEC+ ने मई महीने के लिए तेल उत्पादन में 4.11 लाख बैरल प्रतिदिन बढ़ोतरी की प्लानिंग बनाई. यह पहले 1.35 लाख बैरल प्रतिदिन थी. जॉन इवांस ने इस फैसले की टाइमिंग को “अविश्वसनीय” कहा, क्योंकि वैश्विक तनाव के बीच यह कदम बाजार के लिए और परेशानी बन सकता है.
महंगाई और विवादों के बढ़ने की पूरी संभावनाभले ही ट्रंप के नए शुल्कों से तेल, गैस और परिष्कृत उत्पादों को छूट दी गई हो, लेकिन इससे महंगाई बढ़ने, आर्थिक विकास के धीमा पड़ने और व्यापार विवादों के और भड़कने की पूरी संभावना है, जिससे तेल की कीमतों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.
गोल्डमैन सैक्स के विश्लेषकों ने भी अपने दिसंबर 2025 के तेल मूल्य अनुमान को घटा दिया है. ब्रेंट के लिए लक्ष्य 66 डॉलर और WTI के लिए 62 डॉलर तय किया गया है. बैंक के ऑयल रिसर्च हेड डान स्ट्रायवेन ने चेतावनी दी कि 2026 के लिए तेल की कीमतों पर और भी गिरावट की आशंका है, विशेषकर अगर मंदी की स्थिति बनी रहती है या OPEC+ सप्लाई और बढ़ा देता है.
हालांकि, एनर्जी कंसल्टेंसी फर्म रिस्टैड एनर्जी (Rystad Energy) के विश्लेषकों ने उम्मीद जताई कि तेल की कीमतें फिर से उछाल ले सकती हैं. उनके अनुसार, प्रतिबंधों और शुल्कों के कारण आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिससे कीमतें जल्द ही 70 डॉलर के पार जा सकती हैं. रिस्टैड के कमोडिटी मार्केट प्रमुख मुकेश सहदेव ने कहा, “तेल की कीमतें ज्यादा देर तक नीचे नहीं रहेंगी.”
उपभोक्ता को लाभ होगा या नहीं?कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें 65 डॉलर प्रति बैरल से नीचे गिर गई हैं, जो अगस्त 2021 के बाद का सबसे निचला स्तर है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि आपूर्ति में संभावित रुकावटों के कारण तेल की कीमतें फिर से बढ़ सकती हैं. भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें सीधे तौर पर कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर नहीं करतीं, क्योंकि इनमें टैक्स और अन्य लागतें जुड़ी होती हैं.
अगस्त 2021 में दिल्ली में पेट्रोल 101.84 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल 89.87 रुपये प्रति लीटर थी. यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक कम रहीं, तो भारत में पेट्रोल-डीजल सस्ता हो सकता है, लेकिन यह तत्काल नहीं होगा. यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि क्या कंपनियां कच्चे तेल की कीमतें कम होने पर होने वाले लाभ को उपभोक्ता तक पहुंचाएंगी या नहीं.
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